India’s Coffee Success Story : समृद्धि का निर्माण, भारत की कॉफी इंडस्ट्री की वैश्विक सफलता
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भारत की कॉफी इंडस्ट्री 17वीं शताब्दी से विकसित, वैश्विक बाजार में 5% हिस्सेदारी, और 1.8 बिलियन डॉलर एक्सपोर्ट रिकॉर्ड कर रही है।
भारत की GI टैग वाली और स्पेशलिटी कॉफी, जैसे मॉनसून्ड मालाबार और मैसूर नगेट्स, विश्व बाजार में प्रीमियम पहचान बनाए रखती है।
TDCCOL आदिवासी किसानों को सही मूल्य, बैंक पेमेंट और सस्टेनेबल खेती के जरिए आर्थिक और सामाजिक सशक्तिकरण प्रदान करता है।
नई दिल्ली / भारत की कॉफी की कहानी सदियों पुरानी है, जो केवल पेय पदार्थ नहीं बल्कि देश की आर्थिक और सामाजिक मजबूती का प्रतीक बन गई है। 17वीं शताब्दी में सूफी संत बाबा बुदन ने यमन के मोचा पोर्ट से सात कॉफी बीज लाकर कर्नाटक के चिकमंगलुरु में लगाए थे। यह छोटी शुरुआत आज दुनिया की प्रमुख कॉफी इंडस्ट्री में बदल चुकी है। भारतीय कॉफी न केवल देश के किसानों के लिए रोज़ी-रोटी का साधन बन गई है बल्कि यह वैश्विक बाजार में अपनी गुणवत्ता और अनूठे स्वाद के लिए भी मशहूर है।
कॉफी की खेती और क्षेत्रीय महत्व
भारत में कॉफी मुख्य रूप से कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु में उगाई जाती है, जो कुल उत्पादन का लगभग 96 प्रतिशत देती हैं। कर्नाटक 2,80,275 मीट्रिक टन (2025–26) के उत्पादन के साथ सबसे आगे है। इसके अलावा, आंध्र प्रदेश, ओडिशा और उत्तर-पूर्वी राज्य जैसे असम, मणिपुर और मेघालय में भी कॉफी उत्पादन धीरे-धीरे बढ़ रहा है।
भारत की कॉफी खेती शेड सिस्टम में होती है, जिसमें पेड़ों की ऊंचाई के अनुसार अरेबिका और रोबस्टा उगाई जाती हैं। अरेबिका ठंडे इलाकों में और रोबस्टा गर्म, नमी वाले क्षेत्रों में अधिक उगती है। भारतीय रोबस्टा को विश्वसनीयता और स्वाद के लिए सराहा जाता है, वहीं अरेबिका अपनी विशेष खुशबू और गुणवत्ता के लिए पसंद की जाती है।
GI टैग और स्पेशलिटी कॉफी
भारत में पांच रीजनल और दो स्पेशलिटी कॉफी GI टैग वाली हैं। इनमें कूर्ग अरेबिका, वायनाड रोबस्टा, चिकमगलूर अरेबिका, अराकू वैली अरेबिका और बाबाबुदंगिरीस अरेबिका शामिल हैं। मॉनसून्ड मालाबार रोबस्टा जैसी स्पेशलिटी कॉफी की कीमत वैश्विक बाजार में प्रीमियम रहती है। स्पेशलिटी कॉफी ध्यानपूर्वक चयन, प्रोसेसिंग और पैकेजिंग के बाद तैयार की जाती है, जिससे इसे अंतरराष्ट्रीय खरीदारों के लिए खास बनाया जा सके। मैसूर नगेट्स, रोबस्टा कापी रॉयल और मॉनसून्ड मालाबार AA जैसी किस्में भारतीय कॉफी की विश्व स्तर पर पहचान बन चुकी हैं।
कॉफी बोर्ड ऑफ इंडिया की भूमिका
1942 में स्थापित कॉफी बोर्ड ऑफ इंडिया ने देश की कॉफी इंडस्ट्री को संकटों से बाहर निकाला। बोर्ड रिसर्च, डेवलपमेंट, मार्केटिंग और निर्यात में किसानों और व्यापारियों का सहयोग करता है। इसके तहत इंटीग्रेटेड कॉफी डेवलपमेंट प्रोजेक्ट (ICDP) के माध्यम से ड्राइंग यार्ड और पल्पर यूनिट्स जैसी इंफ्रास्ट्रक्चर सुविधा दी जाती है।
कॉफी बोर्ड फ्लेवर ऑफ इंडिया– द फाइन कप प्रतियोगिता का आयोजन करता है, जिसमें देश की बेहतरीन कॉफी की पहचान की जाती है। इसके अलावा बोर्ड बड़े शहरों में इंडिया कॉफी हाउस का नेटवर्क चलाकर, कंज्यूमर्स को कॉफी के स्वास्थ्य लाभ और स्वाद के बारे में जागरूक करता है।
निर्यात और वैश्विक सफलता
भारत विश्व में पाँचवां सबसे बड़ा कॉफी निर्यातक है और कुल एक्सपोर्ट में इसका हिस्सा लगभग 5 प्रतिशत है। 2024–25 में भारत का कॉफी एक्सपोर्ट 1.8 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया। प्रमुख निर्यातक देश इटली, जर्मनी, बेल्जियम, रशियन फेडरेशन और UAE हैं। भारत-UK CETA और भारत-EFTA TEPA जैसे फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स ने वैश्विक बाजार में भारत की प्रीमियम कॉफी के लिए नए अवसर खोले हैं। GST में कमी और एक्सपोर्ट प्रोत्साहन से देश की इंस्टेंट और वैल्यू एडेड कॉफी की मांग बढ़ी है।
आदिवासी किसानों और TDCCOL की सफलता
ओडिशा में TDCCOL (Tribal Development Co-operative Corporation of Odisha Limited) ने आदिवासी किसानों के लिए कॉफी खरीद और मार्केटिंग का मजबूत मॉडल तैयार किया है।
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किसानों को सही मूल्य और तुरंत भुगतान
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पूरी वैल्यू चेन का प्रबंधन
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सस्टेनेबल खेती और रोजगार के अवसर
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“कोरापुट कॉफी” के ब्रांड के तहत राष्ट्रीय पहचान
इस पहल से स्थानीय अर्थव्यवस्था में सुधार हुआ और आदिवासी समुदायों को आर्थिक और सामाजिक सशक्तिकरण मिला।
भविष्य की दिशा
भारत की कॉफी इंडस्ट्री 2028 तक 8.9% CAGR से बढ़ने की उम्मीद है और आउट-ऑफ-होम कॉफी सेगमेंट 15–20% CAGR तक पहुंच सकता है। कॉफी बोर्ड ने 2047 तक उत्पादन को 9 लाख टन तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा है। यह स्पष्ट है कि भारत की कॉफी केवल पेय नहीं, बल्कि ग्रामीण विकास, रोजगार और वैश्विक पहचान का प्रतीक बन चुकी है।